• पुरु॑ष ए॒वेदꣳ सर्वं॒ यद्भू॒तं यच्च॒ भा॒व्य॑म्। उ॒तामृ॑त॒त्वस्येशा॑नो॒ यदन्ने॑नाति॒रोह॑ति॥
  • ए॒तावा॑नस्य महि॒मातो॒ ज्यायाꣳ॑श्च॒ पूरु॑षः। पादो॑ऽस्य॒ विश्वा॑ भू॒तानि॑ त्रि॒पाद॑स्या॒मृतं॑ दि॒वि॥
  • त्रि॒पादू॒र्ध्व उदै॒त्पुरु॑षः॒ पादो॑ऽस्ये॒हाभ॑व॒त्पुनः॑। ततो॑ वि॒ष्वङ्व्य॑क्रामत्साशनानश॒ने अ॒भि॥
  • ततो॑ वि॒राडजायत वि॒राजो॒ अधि॒ पूरु॑षः। स जा॒तो अत्य॑रिच्यत प॒श्चाद्भूमि॒मथो॑ पु॒रः॥
  • तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुतः॒ सम्भृ॑तं पृषदा॒ज्यम्। प॒शूꣳस्ताꣳश्च॑क्रे वाय॒व्या॑नार॒ण्या ग्राम्या॑श्च॒ ये॥
  • तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुत॑ ऋ॒चः सामा॑नि जज्ञिरे। छन्दाꣳ॑सि जज्ञिरे॒ तस्मा॒द्यजु॒स्तस्मा॑दजायत॥
॥ श्रीमते रामनुजाय नमः ॥

संक्षिप्त इतिहास

2022-23

श्री पद्मवैद्यम् तीर्थ वेद विद्यालय

वाराणसी एवं गोरखपुर की आध्यात्मिक परंपरा से प्रेरित होकर विद्यालय की स्थापना।

हमारी गौरवशाली यात्रा

महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान भारतीय वैदिक ज्ञान, परंपरा एवं संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और विकास के उद्देश्य से स्थापित एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संस्था है। इसकी स्थापना भारत सरकार के तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्रालय, शिक्षा विभाग द्वारा जनवरी 1987 में सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1950 के अंतर्गत एक स्वायत्त संगठन के रूप में की गई थी। प्रतिष्ठान की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य भारत की गौरवशाली वैदिक परंपरा को सुरक्षित रखना तथा आने वाली पीढ़ियों तक वेदों के ज्ञान एवं उनकी मौखिक परंपरा को प्रभावी रूप से पहुँचाना है।

प्रतिष्ठान द्वारा विभिन्न पाठशालाओं, शैक्षणिक संस्थानों एवं अन्य माध्यमों के सहयोग से वेदों के अध्ययन और अध्यापन को प्रोत्साहित किया जाता है। वैदिक शिक्षा की प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा को आधुनिक समय में जीवंत बनाए रखने के साथ-साथ विद्यार्थियों को वेदों के व्यवस्थित एवं अनुशासित अध्ययन का अवसर प्रदान करना इसके प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है।

मई 1993 में प्रतिष्ठान को उज्जैन स्थानांतरित किया गया। उज्जैन जैसे ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक नगर में स्थापित होने के पश्चात इसका नाम महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान रखा गया। यह नाम भारतीय वैदिक एवं ऋषि परंपरा की महान विरासत से जुड़ा हुआ है। प्रतिष्ठान आज भी वैदिक शिक्षा एवं संस्कृति के क्षेत्र में निरंतर कार्य करते हुए प्राचीन ज्ञान परंपरा को संरक्षित एवं विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

प्रतिष्ठान द्वारा वैदिक सस्वर उच्चारण की मौखिक परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखने के उद्देश्य से विभिन्न शैक्षणिक पाठ्यक्रमों का सफलतापूर्वक संचालन किया जा रहा है। इन पाठ्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों को वेदों के अध्ययन के साथ-साथ उनके शुद्ध एवं सस्वर उच्चारण में भी दक्ष बनाया जाता है। प्रतिष्ठान के अंतर्गत संचालित वेद भूषण (पंचवर्षीय) पाठ्यक्रम का प्रमाण-पत्र कक्षा 10 के समकक्ष माना जाता है, जबकि वेद विभूषण (सप्तवर्षीय) पाठ्यक्रम का प्रमाण-पत्र कक्षा 12 के समकक्ष है। वेद विभूषण पाठ्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य विद्यार्थियों को एक वेद की एक शाखा में पूर्ण रूप से पारंगत बनाना है। इस पाठ्यक्रम में प्रत्येक विद्यार्थी की शिक्षण अवधि सात वर्ष निर्धारित है।

वैदिक शिक्षा को व्यापक स्तर पर बढ़ावा देने के साथ-साथ प्रतिष्ठान विभिन्न शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं ज्ञानवर्धक कार्यक्रमों का भी आयोजन करता है। वैदिक सम्मेलन, शोध संगोष्ठी, वेद ज्ञान सप्ताह, कौशल विकास से संबंधित योजनाएँ तथा सभी के लिए वैदिक कथाओं जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से वैदिक ज्ञान को समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुँचाने का प्रयास किया जाता है। इन गतिविधियों का उद्देश्य केवल वेदों के अध्ययन को बढ़ावा देना ही नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति नई पीढ़ी में जागरूकता एवं सम्मान की भावना विकसित करना भी है।

इसी महान वैदिक परंपरा एवं उद्देश्य को आगे बढ़ाते हुए श्री पद्मवैद्यम् तीर्थ वेद विद्यालय की स्थापना वर्ष 2022 में हुई। वाराणसी में बाबा विश्वनाथ की पावन नगरी तथा गोरखपुर में गुरु गोरक्षनाथ की आध्यात्मिक परंपरा के सान्निध्य से प्रेरित होकर विद्यालय की स्थापना गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से भारतीय संस्कृति, ऋषि परंपरा एवं वैदिक ज्ञान के संरक्षण और संवर्धन के उद्देश्य से की गई।

श्री पद्मवैद्यम् तीर्थ वेद विद्यालय को महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान, उज्जैन से मान्यता प्राप्त है। विद्यालय में विद्यार्थियों को ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद सहित वैदिक शिक्षा प्रदान की जाती है। इसके साथ ही विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखते हुए आधुनिक विषयों का भी शिक्षण कराया जाता है। इस प्रकार विद्यालय प्राचीन वैदिक ज्ञान और आधुनिक शिक्षा के बीच एक संतुलित एवं सार्थक समन्वय स्थापित करने का प्रयास करता है।

विद्यालय के वैदिक बटुक नियमित रूप से मंदिर प्रांगण में वेद-पारायण एवं भगवती सूक्त का पाठ करते हैं। वैदिक अध्ययन के साथ विद्यार्थियों को विभिन्न सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं शैक्षणिक गतिविधियों में सक्रिय सहभागिता के अवसर भी प्रदान किए जाते हैं। विद्यालय के बटुक जिले में आयोजित विभिन्न गीत, मंत्र, पाठ एवं अंत्याक्षरी जैसी प्रतियोगिताओं में निरंतर भाग लेते हैं और अनेक अवसरों पर प्रथम स्थान प्राप्त कर अपने अभिभावकों एवं विद्यालय को गौरवान्वित कर चुके हैं।

विद्यालय का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को वैदिक ग्रंथों का ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि उन्हें भारतीय संस्कृति, संस्कार, अनुशासन, आध्यात्मिक मूल्यों एवं हमारी समृद्ध ज्ञान परंपरा से जोड़ना भी है। गुरु-शिष्य परंपरा के आदर्शों के माध्यम से विद्यार्थियों में ज्ञान, संस्कार एवं संस्कृति के प्रति सम्मान की भावना विकसित करने का निरंतर प्रयास किया जाता है।

आज श्री पद्मवैद्यम् तीर्थ वेद विद्यालय वैदिक शिक्षा एवं भारतीय संस्कृति की उस महान परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है, जिसने सदियों से भारतीय समाज को ज्ञान, संस्कार और आध्यात्मिक दिशा प्रदान की है। विद्यालय का संकल्प है कि वेद-विद्या के प्रकाश से नई पीढ़ी को संस्कारित करते हुए सनातन संस्कृति, भारतीय ज्ञान परंपरा एवं आध्यात्मिक मूल्यों की अखंड ज्योति सदैव प्रज्वलित रहे। इसी संकल्प के साथ विद्यालय वैदिक शिक्षा, संस्कृति एवं ज्ञान की इस अमूल्य विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने की दिशा में निरंतर प्रयासरत है।

वेद-विद्या के प्रकाश से नई पीढ़ी को संस्कारित करना — यही हमारा संकल्प है