• पुरु॑ष ए॒वेदꣳ सर्वं॒ यद्भू॒तं यच्च॒ भा॒व्य॑म्। उ॒तामृ॑त॒त्वस्येशा॑नो॒ यदन्ने॑नाति॒रोह॑ति॥
  • ए॒तावा॑नस्य महि॒मातो॒ ज्यायाꣳ॑श्च॒ पूरु॑षः। पादो॑ऽस्य॒ विश्वा॑ भू॒तानि॑ त्रि॒पाद॑स्या॒मृतं॑ दि॒वि॥
  • त्रि॒पादू॒र्ध्व उदै॒त्पुरु॑षः॒ पादो॑ऽस्ये॒हाभ॑व॒त्पुनः॑। ततो॑ वि॒ष्वङ्व्य॑क्रामत्साशनानश॒ने अ॒भि॥
  • ततो॑ वि॒राडजायत वि॒राजो॒ अधि॒ पूरु॑षः। स जा॒तो अत्य॑रिच्यत प॒श्चाद्भूमि॒मथो॑ पु॒रः॥
  • तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुतः॒ सम्भृ॑तं पृषदा॒ज्यम्। प॒शूꣳस्ताꣳश्च॑क्रे वाय॒व्या॑नार॒ण्या ग्राम्या॑श्च॒ ये॥
  • तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुत॑ ऋ॒चः सामा॑नि जज्ञिरे। छन्दाꣳ॑सि जज्ञिरे॒ तस्मा॒द्यजु॒स्तस्मा॑दजायत॥
॥ श्रीमते रामनुजाय नमः ॥

दर्शन विभाग

भारतीय दर्शन परंपरा जीवन, जगत एवं आत्मा के गूढ़ प्रश्नों का तार्किक एवं आध्यात्मिक समाधान प्रस्तुत करती है। हमारे विभाग में विद्यार्थियों को षड्दर्शन की समृद्ध परंपरा का व्यवस्थित एवं गहन अध्ययन कराया जाता है।

विभागीय आचार्य

डॉ. वागीश शास्त्री

डॉ. वागीश शास्त्री

विभागाध्यक्ष – दर्शन शास्त्र
विशेषज्ञता: वेदांत दर्शन एवं उपनिषद अध्ययन
विद्यावारिधि (पीएच.डी.), दर्शनाचार्य
22+ वर्ष का अनुभव
आचार्य श्री केशवानंद उपाध्याय

आचार्य श्री केशवानंद उपाध्याय

सहायक आचार्य – दर्शन शास्त्र
विशेषज्ञता: न्याय-वैशेषिक एवं सांख्य-योग दर्शन
आचार्य (दर्शन शास्त्र), शास्त्री
11+ वर्ष का अनुभव

षड्दर्शन परिचय

षड्दर्शन परिचय

भारतीय दर्शन परंपरा में छह प्रमुख दर्शन (षड्दर्शन) मान्य हैं — न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा एवं वेदांत। ये सभी वेदों पर आधारित होकर सत्य, आत्मा, जगत एवं मोक्ष का गहन विवेचन करते हैं।

न्याय एवं वैशेषिक दर्शन

महर्षि गौतम प्रणीत न्याय दर्शन तर्कशास्त्र एवं प्रमाण-विज्ञान पर आधारित है, जबकि महर्षि कणाद प्रणीत वैशेषिक दर्शन सृष्टि के मूल तत्वों (द्रव्य, गुण, कर्म आदि) का वैज्ञानिक विश्लेषण करता है।

सांख्य एवं योग दर्शन

महर्षि कपिल प्रणीत सांख्य दर्शन प्रकृति एवं पुरुष के भेद को स्पष्ट करता है, तथा महर्षि पतंजलि प्रणीत योग दर्शन अष्टांग योग के माध्यम से चित्तवृत्ति निरोध एवं आत्मसाक्षात्कार का मार्ग दिखाता है।

मीमांसा एवं वेदांत दर्शन

महर्षि जैमिनि प्रणीत पूर्व मीमांसा वैदिक कर्मकांड की व्याख्या करती है, जबकि बादरायण व्यास प्रणीत उत्तर मीमांसा (वेदांत) ब्रह्मविद्या एवं आत्मज्ञान पर केंद्रित है — जो उपनिषदों का सार है।

वर्ष-वार अध्ययन क्रम

प्रथम – द्वितीय वर्षषड्दर्शन का परिचयात्मक अध्ययन, तर्कसंग्रह का प्रारंभिक अभ्यास, संस्कृत में दार्शनिक शब्दावली का परिचय
तृतीय – चतुर्थ वर्षन्याय-वैशेषिक के मूल सिद्धांत, सांख्य-योग के तत्वज्ञान का अध्ययन, प्रमाण-मीमांसा का प्रारंभिक अभ्यास
पंचम वर्षपूर्व मीमांसा के कर्मकांड सिद्धांत, वेदांत सूत्र का परिचय, वेद भूषण मूल्यांकन परीक्षा हेतु तैयारी
षष्ठम – सप्तम वर्ष (वेद विभूषण)उपनिषद एवं वेदांत दर्शन का गहन अध्ययन, ब्रह्मसूत्र एवं शांकर भाष्य का परिचय, दार्शनिक वाद-विवाद एवं शास्त्रार्थ क्षमता का विकास

कृपया ध्यान दें: दर्शन शास्त्र का अध्ययन मुख्यतः वेद विभूषण पाठ्यक्रम के उच्च वर्षों में कराया जाता है, क्योंकि इसके लिए संहिता एवं व्याकरण की आधारभूत समझ आवश्यक है। विस्तृत जानकारी हेतु पाठ्यक्रम विवरणिका पृष्ठ देखें।

"तत्त्वमसि" — वह (ब्रह्म) तू ही है। वेदांत दर्शन का यह महावाक्य आत्मा और ब्रह्म की एकता का प्रतीक है।