भारतीय दर्शन परंपरा जीवन, जगत एवं आत्मा के गूढ़ प्रश्नों का तार्किक एवं आध्यात्मिक समाधान प्रस्तुत करती है। हमारे विभाग में विद्यार्थियों को षड्दर्शन की समृद्ध परंपरा का व्यवस्थित एवं गहन अध्ययन कराया जाता है।


भारतीय दर्शन परंपरा में छह प्रमुख दर्शन (षड्दर्शन) मान्य हैं — न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा एवं वेदांत। ये सभी वेदों पर आधारित होकर सत्य, आत्मा, जगत एवं मोक्ष का गहन विवेचन करते हैं।
महर्षि गौतम प्रणीत न्याय दर्शन तर्कशास्त्र एवं प्रमाण-विज्ञान पर आधारित है, जबकि महर्षि कणाद प्रणीत वैशेषिक दर्शन सृष्टि के मूल तत्वों (द्रव्य, गुण, कर्म आदि) का वैज्ञानिक विश्लेषण करता है।
महर्षि कपिल प्रणीत सांख्य दर्शन प्रकृति एवं पुरुष के भेद को स्पष्ट करता है, तथा महर्षि पतंजलि प्रणीत योग दर्शन अष्टांग योग के माध्यम से चित्तवृत्ति निरोध एवं आत्मसाक्षात्कार का मार्ग दिखाता है।
महर्षि जैमिनि प्रणीत पूर्व मीमांसा वैदिक कर्मकांड की व्याख्या करती है, जबकि बादरायण व्यास प्रणीत उत्तर मीमांसा (वेदांत) ब्रह्मविद्या एवं आत्मज्ञान पर केंद्रित है — जो उपनिषदों का सार है।
कृपया ध्यान दें: दर्शन शास्त्र का अध्ययन मुख्यतः वेद विभूषण पाठ्यक्रम के उच्च वर्षों में कराया जाता है, क्योंकि इसके लिए संहिता एवं व्याकरण की आधारभूत समझ आवश्यक है। विस्तृत जानकारी हेतु पाठ्यक्रम विवरणिका पृष्ठ देखें।
"तत्त्वमसि" — वह (ब्रह्म) तू ही है। वेदांत दर्शन का यह महावाक्य आत्मा और ब्रह्म की एकता का प्रतीक है।