संस्कृत व्याकरण वेदों के शुद्ध अध्ययन एवं सही अर्थ-बोध की नींव है। हमारे विभाग में विद्यार्थियों को महर्षि पाणिनी की अष्टाध्यायी परंपरा के अनुसार व्याकरण का व्यवस्थित एवं गहन प्रशिक्षण दिया जाता है।

महर्षि पाणिनी द्वारा रचित अष्टाध्यायी संस्कृत व्याकरण का सर्वाधिक प्रमाणिक एवं वैज्ञानिक ग्रंथ है, जिसमें आठ अध्यायों में लगभग 4000 सूत्रों के माध्यम से संपूर्ण संस्कृत भाषा की संरचना का विवेचन किया गया है।
पतंजलि रचित महाभाष्य तथा काशिका वृत्ति अष्टाध्यायी के सूत्रों की गहन व्याख्या करने वाले प्रमुख ग्रंथ हैं, जिनका अध्ययन उच्च वर्षों में कराया जाता है।
व्याकरण अध्ययन की नींव शब्द रूप (संज्ञा रूपों) एवं धातु रूप (क्रिया रूपों) के अभ्यास से रखी जाती है, जो वेद मंत्रों के सही अर्थ-बोध हेतु अनिवार्य है।
वेदों के शब्दों की व्युत्पत्ति एवं अर्थ-निर्धारण हेतु निरुक्त शास्त्र का अध्ययन कराया जाता है, जो वेदांगों में व्याकरण के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा है।
कृपया ध्यान दें: व्याकरण अध्ययन सभी वेद शाखाओं के विद्यार्थियों हेतु अनिवार्य एवं सहायक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है, क्योंकि यह वेद मंत्रों के शुद्ध उच्चारण एवं सही अर्थ-बोध की नींव है। विस्तृत जानकारी हेतु पाठ्यक्रम विवरणिका पृष्ठ देखें।
"व्याकरणं नाम शब्दानुशासनम्" — व्याकरण शब्दों का अनुशासन है, जो भाषा की शुद्धता एवं ज्ञान की स्पष्टता का आधार है।