• पुरु॑ष ए॒वेदꣳ सर्वं॒ यद्भू॒तं यच्च॒ भा॒व्य॑म्। उ॒तामृ॑त॒त्वस्येशा॑नो॒ यदन्ने॑नाति॒रोह॑ति॥
  • ए॒तावा॑नस्य महि॒मातो॒ ज्यायाꣳ॑श्च॒ पूरु॑षः। पादो॑ऽस्य॒ विश्वा॑ भू॒तानि॑ त्रि॒पाद॑स्या॒मृतं॑ दि॒वि॥
  • त्रि॒पादू॒र्ध्व उदै॒त्पुरु॑षः॒ पादो॑ऽस्ये॒हाभ॑व॒त्पुनः॑। ततो॑ वि॒ष्वङ्व्य॑क्रामत्साशनानश॒ने अ॒भि॥
  • ततो॑ वि॒राडजायत वि॒राजो॒ अधि॒ पूरु॑षः। स जा॒तो अत्य॑रिच्यत प॒श्चाद्भूमि॒मथो॑ पु॒रः॥
  • तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुतः॒ सम्भृ॑तं पृषदा॒ज्यम्। प॒शूꣳस्ताꣳश्च॑क्रे वाय॒व्या॑नार॒ण्या ग्राम्या॑श्च॒ ये॥
  • तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुत॑ ऋ॒चः सामा॑नि जज्ञिरे। छन्दाꣳ॑सि जज्ञिरे॒ तस्मा॒द्यजु॒स्तस्मा॑दजायत॥
॥ श्रीमते रामनुजाय नमः ॥

व्याकरण विभाग

संस्कृत व्याकरण वेदों के शुद्ध अध्ययन एवं सही अर्थ-बोध की नींव है। हमारे विभाग में विद्यार्थियों को महर्षि पाणिनी की अष्टाध्यायी परंपरा के अनुसार व्याकरण का व्यवस्थित एवं गहन प्रशिक्षण दिया जाता है।

विभागीय आचार्य

श्री अश्वनी शुक्ल

श्री अश्वनी शुक्ल

व्याकरण शिक्षक
विशेषज्ञता:
आचार्य
3 वर्ष का अनुभव

प्रमुख ग्रंथ एवं विषय परिचय

पाणिनीय अष्टाध्यायी

महर्षि पाणिनी द्वारा रचित अष्टाध्यायी संस्कृत व्याकरण का सर्वाधिक प्रमाणिक एवं वैज्ञानिक ग्रंथ है, जिसमें आठ अध्यायों में लगभग 4000 सूत्रों के माध्यम से संपूर्ण संस्कृत भाषा की संरचना का विवेचन किया गया है।

महाभाष्य एवं काशिका वृत्ति

पतंजलि रचित महाभाष्य तथा काशिका वृत्ति अष्टाध्यायी के सूत्रों की गहन व्याख्या करने वाले प्रमुख ग्रंथ हैं, जिनका अध्ययन उच्च वर्षों में कराया जाता है।

शब्द रूप एवं धातु रूप

व्याकरण अध्ययन की नींव शब्द रूप (संज्ञा रूपों) एवं धातु रूप (क्रिया रूपों) के अभ्यास से रखी जाती है, जो वेद मंत्रों के सही अर्थ-बोध हेतु अनिवार्य है।

निरुक्त एवं वेदांग व्याकरण

वेदों के शब्दों की व्युत्पत्ति एवं अर्थ-निर्धारण हेतु निरुक्त शास्त्र का अध्ययन कराया जाता है, जो वेदांगों में व्याकरण के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा है।

वर्ष-वार अध्ययन क्रम

प्रथम – द्वितीय वर्षसंस्कृत वर्णमाला, संधि प्रकरण, प्रारंभिक शब्द रूप (राम, हरि, गुरु आदि), सरल धातु रूप (भू, पठ्, गम् आदि)
तृतीय – चतुर्थ वर्षकारक एवं विभक्ति प्रकरण, समास प्रकरण, तद्धित एवं कृदंत प्रत्यय, अष्टाध्यायी के प्रारंभिक सूत्रों का परिचय
पंचम वर्षअष्टाध्यायी के प्रमुख अध्यायों का अध्ययन, संस्कृत निबंध एवं भाषण अभ्यास, वेद भूषण मूल्यांकन परीक्षा हेतु तैयारी
षष्ठम – सप्तम वर्ष (वेद विभूषण)अष्टाध्यायी का पूर्ण एवं गहन अध्ययन, महाभाष्य एवं काशिका वृत्ति का परिचय, निरुक्त शास्त्र, संस्कृत काव्य-रचना क्षमता का विकास

कृपया ध्यान दें: व्याकरण अध्ययन सभी वेद शाखाओं के विद्यार्थियों हेतु अनिवार्य एवं सहायक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है, क्योंकि यह वेद मंत्रों के शुद्ध उच्चारण एवं सही अर्थ-बोध की नींव है। विस्तृत जानकारी हेतु पाठ्यक्रम विवरणिका पृष्ठ देखें।

"व्याकरणं नाम शब्दानुशासनम्" — व्याकरण शब्दों का अनुशासन है, जो भाषा की शुद्धता एवं ज्ञान की स्पष्टता का आधार है।