संस्कृत साहित्य भारतीय ज्ञान परंपरा का श्रृंगार है, जिसमें काव्य, नाटक एवं नीति ग्रंथों के माध्यम से जीवन-मूल्यों, सौंदर्यबोध एवं भाषा-कौशल का विकास होता है। हमारे विभाग में विद्यार्थियों को इस समृद्ध साहित्यिक परंपरा से जोड़ा जाता है।


संस्कृत साहित्य में रघुवंशम्, कुमारसंभवम्, किरातार्जुनीयम्, शिशुपालवधम् एवं नैषधीयचरितम् — इन पाँच ग्रंथों को पंचमहाकाव्य कहा जाता है, जो काव्य-रचना की उत्कृष्टता के आदर्श उदाहरण माने जाते हैं।
काव्य की रचना-विधि, रस, छंद, अलंकार (उपमा, रूपक, यमक आदि) एवं ध्वनि सिद्धांत का अध्ययन काव्यशास्त्र के अंतर्गत कराया जाता है, जो भरत मुनि के नाट्यशास्त्र एवं आनंदवर्धन के ध्वन्यालोक जैसे ग्रंथों पर आधारित है।
महाकवि कालिदास रचित अभिज्ञान शाकुंतलम् जैसे नाटकों तथा दंडी एवं बाणभट्ट रचित गद्य काव्यों (दशकुमारचरितम्, कादंबरी) का अध्ययन विद्यार्थियों की साहित्यिक अभिरुचि विकसित करता है।
भर्तृहरि के नीतिशतक, पंचतंत्र एवं हितोपदेश जैसे नीति ग्रंथों का अध्ययन विद्यार्थियों में व्यावहारिक ज्ञान, नैतिक मूल्यों एवं जीवन-दृष्टि का विकास करता है।
कृपया ध्यान दें: संस्कृत साहित्य का अध्ययन व्याकरण विभाग के साथ समन्वित रूप से कराया जाता है, क्योंकि काव्य-रचना एवं छंदशास्त्र के लिए व्याकरण की सुदृढ़ नींव आवश्यक है। विस्तृत जानकारी हेतु पाठ्यक्रम विवरणिका पृष्ठ देखें।
"काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये। सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे॥" — काव्य यश, अर्थ, व्यवहार-ज्ञान, मंगल एवं आनंद प्रदान करने वाला होता है।