• पुरु॑ष ए॒वेदꣳ सर्वं॒ यद्भू॒तं यच्च॒ भा॒व्य॑म्। उ॒तामृ॑त॒त्वस्येशा॑नो॒ यदन्ने॑नाति॒रोह॑ति॥
  • ए॒तावा॑नस्य महि॒मातो॒ ज्यायाꣳ॑श्च॒ पूरु॑षः। पादो॑ऽस्य॒ विश्वा॑ भू॒तानि॑ त्रि॒पाद॑स्या॒मृतं॑ दि॒वि॥
  • त्रि॒पादू॒र्ध्व उदै॒त्पुरु॑षः॒ पादो॑ऽस्ये॒हाभ॑व॒त्पुनः॑। ततो॑ वि॒ष्वङ्व्य॑क्रामत्साशनानश॒ने अ॒भि॥
  • ततो॑ वि॒राडजायत वि॒राजो॒ अधि॒ पूरु॑षः। स जा॒तो अत्य॑रिच्यत प॒श्चाद्भूमि॒मथो॑ पु॒रः॥
  • तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुतः॒ सम्भृ॑तं पृषदा॒ज्यम्। प॒शूꣳस्ताꣳश्च॑क्रे वाय॒व्या॑नार॒ण्या ग्राम्या॑श्च॒ ये॥
  • तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुत॑ ऋ॒चः सामा॑नि जज्ञिरे। छन्दाꣳ॑सि जज्ञिरे॒ तस्मा॒द्यजु॒स्तस्मा॑दजायत॥
॥ श्रीमते रामनुजाय नमः ॥

साहित्य विभाग

संस्कृत साहित्य भारतीय ज्ञान परंपरा का श्रृंगार है, जिसमें काव्य, नाटक एवं नीति ग्रंथों के माध्यम से जीवन-मूल्यों, सौंदर्यबोध एवं भाषा-कौशल का विकास होता है। हमारे विभाग में विद्यार्थियों को इस समृद्ध साहित्यिक परंपरा से जोड़ा जाता है।

विभागीय आचार्य

आचार्य श्री जनार्दन मिश्र

आचार्य श्री जनार्दन मिश्र

विभागाध्यक्ष – संस्कृत साहित्य
विशेषज्ञता: काव्यशास्त्र एवं पंचमहाकाव्य
साहित्याचार्य, आचार्य (धर्मशास्त्र)
16+ वर्ष का अनुभव
आचार्य श्री रघुनाथ प्रसाद द्विवेदी

आचार्य श्री रघुनाथ प्रसाद द्विवेदी

सहायक आचार्य – संस्कृत साहित्य
विशेषज्ञता: नीति साहित्य एवं छंदशास्त्र
साहित्याचार्य, शास्त्री (संस्कृत)
8+ वर्ष का अनुभव

प्रमुख ग्रंथ एवं विषय परिचय

पंचमहाकाव्य

संस्कृत साहित्य में रघुवंशम्, कुमारसंभवम्, किरातार्जुनीयम्, शिशुपालवधम् एवं नैषधीयचरितम् — इन पाँच ग्रंथों को पंचमहाकाव्य कहा जाता है, जो काव्य-रचना की उत्कृष्टता के आदर्श उदाहरण माने जाते हैं।

काव्यशास्त्र एवं अलंकार शास्त्र

काव्य की रचना-विधि, रस, छंद, अलंकार (उपमा, रूपक, यमक आदि) एवं ध्वनि सिद्धांत का अध्ययन काव्यशास्त्र के अंतर्गत कराया जाता है, जो भरत मुनि के नाट्यशास्त्र एवं आनंदवर्धन के ध्वन्यालोक जैसे ग्रंथों पर आधारित है।

नाटक एवं गद्य साहित्य

महाकवि कालिदास रचित अभिज्ञान शाकुंतलम् जैसे नाटकों तथा दंडी एवं बाणभट्ट रचित गद्य काव्यों (दशकुमारचरितम्, कादंबरी) का अध्ययन विद्यार्थियों की साहित्यिक अभिरुचि विकसित करता है।

सुभाषित एवं नीति साहित्य

भर्तृहरि के नीतिशतक, पंचतंत्र एवं हितोपदेश जैसे नीति ग्रंथों का अध्ययन विद्यार्थियों में व्यावहारिक ज्ञान, नैतिक मूल्यों एवं जीवन-दृष्टि का विकास करता है।

वर्ष-वार अध्ययन क्रम

प्रथम – द्वितीय वर्षसरल संस्कृत गद्य-पद्य पाठ, सुभाषित एवं श्लोक कंठस्थीकरण, पंचतंत्र की कथाओं का परिचय
तृतीय – चतुर्थ वर्षनीतिशतक एवं हितोपदेश का अध्ययन, छंदशास्त्र का परिचय, लघु काव्य अंशों का पठन-पाठन
पंचम वर्षरघुवंशम् अथवा कुमारसंभवम् के चयनित सर्गों का अध्ययन, अलंकार एवं रस सिद्धांत का परिचय, वेद भूषण मूल्यांकन परीक्षा हेतु तैयारी
षष्ठम – सप्तम वर्ष (वेद विभूषण)पंचमहाकाव्यों का विस्तृत अध्ययन, काव्यशास्त्र एवं ध्वनि सिद्धांत का गहन विवेचन, स्वतंत्र संस्कृत काव्य-रचना एवं वाक्पटुता का अभ्यास

कृपया ध्यान दें: संस्कृत साहित्य का अध्ययन व्याकरण विभाग के साथ समन्वित रूप से कराया जाता है, क्योंकि काव्य-रचना एवं छंदशास्त्र के लिए व्याकरण की सुदृढ़ नींव आवश्यक है। विस्तृत जानकारी हेतु पाठ्यक्रम विवरणिका पृष्ठ देखें।

"काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये। सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे॥" — काव्य यश, अर्थ, व्यवहार-ज्ञान, मंगल एवं आनंद प्रदान करने वाला होता है।