सामवेद संगीतमय सस्वर गान एवं स्तुतियों की समृद्ध परंपरा पर आधारित है। हमारे विभाग में विद्यार्थियों को उद्गाता परंपरा के अनुसार शुद्ध स्वर एवं गान विद्या का गहन प्रशिक्षण दिया जाता है।

सामवेद ऋग्वेद के ही अनेक मंत्रों को संगीतमय स्वरों में गाने की परंपरा पर आधारित है। इसे 'साम' अर्थात गान कहा जाता है, जो यज्ञ के दौरान उद्गाता द्वारा गाया जाता है।
सामवेद की प्रमुख शाखाओं में कौथुमीय, राणायनीय एवं जैमिनीय शाखा प्रचलित हैं। हमारे विद्यालय में परंपरा एवं क्षेत्रीय प्रचलन के अनुसार शाखा का अध्ययन कराया जाता है।
सामवेद के अध्ययन में सस्वर गान अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें उद्गीथ, प्रस्ताव, उद्गान, प्रतिहार एवं निधन जैसे संगीतमय अंगों का विस्तृत अभ्यास कराया जाता है।
सामवेद की परंपरा से जुड़ा छान्दोग्य उपनिषद वेदांत दर्शन का एक प्रमुख ग्रंथ है, जिसमें ब्रह्मविद्या, आत्मज्ञान एवं ओंकार की महिमा का गहन विवेचन है।
कृपया ध्यान दें: सामवेद (वेद विभूषण) पाठ्यक्रम की पूर्ण अवधि सात वर्ष निर्धारित है, जिसका उद्देश्य विद्यार्थी को इस शाखा में पूर्ण रूप से पारंगत बनाना है। विस्तृत जानकारी हेतु पाठ्यक्रम विवरणिका पृष्ठ देखें।
"अग्न आ याहि वीतये" — सामवेद का यह प्रथम गीत अग्नि देव के आह्वान का मंगल स्वर है।