शुक्ल यजुर्वेद यज्ञ-कर्मकांड एवं अनुष्ठान विधियों से संबंधित मंत्रों का व्यवस्थित संग्रह है, जिसे स्पष्ट एवं शुद्ध संकलन के कारण 'शुक्ल' कहा जाता है। हमारे विभाग में इसका गहन एवं परंपरागत अध्ययन कराया जाता है।

शुक्ल यजुर्वेद की मूल संहिता को वाजसनेयी संहिता कहा जाता है, जिसका श्रेय महर्षि याज्ञवल्क्य को दिया जाता है। इसमें मंत्र एवं ब्राह्मण भाग स्पष्टतः पृथक-पृथक संकलित हैं, इसीलिए इसे 'शुक्ल' (स्पष्ट/शुद्ध) कहा जाता है।
शुक्ल यजुर्वेद की दो प्रमुख शाखाएँ प्रचलित हैं — माध्यंदिन शाखा एवं काण्व शाखा। हमारे विद्यालय में परंपरा एवं क्षेत्रीय प्रचलन के अनुसार शाखा का अध्ययन कराया जाता है।
शुक्ल यजुर्वेद से संबंधित शतपथ ब्राह्मण यज्ञ-कर्मकांड की विस्तृत व्याख्या, दार्शनिक विवेचन एवं सृष्टि-कथाओं का समृद्ध स्रोत है, जिसका अध्ययन उच्च वर्षों में कराया जाता है।
शुक्ल यजुर्वेद की परंपरा से जुड़ा बृहदारण्यक उपनिषद वेदांत दर्शन का एक प्रमुख ग्रंथ है, जो आत्मज्ञान एवं ब्रह्मविद्या पर केंद्रित है।
कृपया ध्यान दें: शुक्ल यजुर्वेद (वेद विभूषण) पाठ्यक्रम की पूर्ण अवधि सात वर्ष निर्धारित है, जिसका उद्देश्य विद्यार्थी को इस शाखा में पूर्ण रूप से पारंगत बनाना है। विस्तृत जानकारी हेतु पाठ्यक्रम विवरणिका पृष्ठ देखें।
"ॐ इषे त्वोर्जे त्वा" — शुक्ल यजुर्वेद का यह प्रथम मंत्र यज्ञ-कर्म के मंगलाचरण का प्रतीक है।