• पुरु॑ष ए॒वेदꣳ सर्वं॒ यद्भू॒तं यच्च॒ भा॒व्य॑म्। उ॒तामृ॑त॒त्वस्येशा॑नो॒ यदन्ने॑नाति॒रोह॑ति॥
  • ए॒तावा॑नस्य महि॒मातो॒ ज्यायाꣳ॑श्च॒ पूरु॑षः। पादो॑ऽस्य॒ विश्वा॑ भू॒तानि॑ त्रि॒पाद॑स्या॒मृतं॑ दि॒वि॥
  • त्रि॒पादू॒र्ध्व उदै॒त्पुरु॑षः॒ पादो॑ऽस्ये॒हाभ॑व॒त्पुनः॑। ततो॑ वि॒ष्वङ्व्य॑क्रामत्साशनानश॒ने अ॒भि॥
  • ततो॑ वि॒राडजायत वि॒राजो॒ अधि॒ पूरु॑षः। स जा॒तो अत्य॑रिच्यत प॒श्चाद्भूमि॒मथो॑ पु॒रः॥
  • तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुतः॒ सम्भृ॑तं पृषदा॒ज्यम्। प॒शूꣳस्ताꣳश्च॑क्रे वाय॒व्या॑नार॒ण्या ग्राम्या॑श्च॒ ये॥
  • तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुत॑ ऋ॒चः सामा॑नि जज्ञिरे। छन्दाꣳ॑सि जज्ञिरे॒ तस्मा॒द्यजु॒स्तस्मा॑दजायत॥
॥ श्रीमते रामनुजाय नमः ॥

शुक्ल यजुर्वेद विभाग

शुक्ल यजुर्वेद यज्ञ-कर्मकांड एवं अनुष्ठान विधियों से संबंधित मंत्रों का व्यवस्थित संग्रह है, जिसे स्पष्ट एवं शुद्ध संकलन के कारण 'शुक्ल' कहा जाता है। हमारे विभाग में इसका गहन एवं परंपरागत अध्ययन कराया जाता है।

विभागीय आचार्य

प्रेम नारायण त्रिपाठी

प्रेम नारायण त्रिपाठी

वेदाध्यापक
विशेषज्ञता:
वेदाध्यापक
15 वर्ष का अनुभव

शाखा एवं ग्रंथ परिचय

वाजसनेयी संहिता

शुक्ल यजुर्वेद की मूल संहिता को वाजसनेयी संहिता कहा जाता है, जिसका श्रेय महर्षि याज्ञवल्क्य को दिया जाता है। इसमें मंत्र एवं ब्राह्मण भाग स्पष्टतः पृथक-पृथक संकलित हैं, इसीलिए इसे 'शुक्ल' (स्पष्ट/शुद्ध) कहा जाता है।

माध्यंदिन एवं काण्व शाखा

शुक्ल यजुर्वेद की दो प्रमुख शाखाएँ प्रचलित हैं — माध्यंदिन शाखा एवं काण्व शाखा। हमारे विद्यालय में परंपरा एवं क्षेत्रीय प्रचलन के अनुसार शाखा का अध्ययन कराया जाता है।

शतपथ ब्राह्मण

शुक्ल यजुर्वेद से संबंधित शतपथ ब्राह्मण यज्ञ-कर्मकांड की विस्तृत व्याख्या, दार्शनिक विवेचन एवं सृष्टि-कथाओं का समृद्ध स्रोत है, जिसका अध्ययन उच्च वर्षों में कराया जाता है।

बृहदारण्यक उपनिषद

शुक्ल यजुर्वेद की परंपरा से जुड़ा बृहदारण्यक उपनिषद वेदांत दर्शन का एक प्रमुख ग्रंथ है, जो आत्मज्ञान एवं ब्रह्मविद्या पर केंद्रित है।

वर्ष-वार अध्ययन क्रम

प्रथम – द्वितीय वर्षवाजसनेयी संहिता का मूल पाठ, शुद्ध उच्चारण एवं स्वराघात अभ्यास, संस्कृत वर्णमाला एवं प्रारंभिक व्याकरण
तृतीय – चतुर्थ वर्षसंहिता पाठ में दक्षता, पद पाठ का अभ्यास, यज्ञ-कर्मकांड की आधारभूत विधियाँ, वैदिक व्याकरण
पंचम वर्षक्रम पाठ का अभ्यास, वेद भूषण मूल्यांकन परीक्षा हेतु तैयारी, यज्ञोपवीत संस्कार एवं आचार शिक्षा
षष्ठम – सप्तम वर्ष (वेद विभूषण)जटा एवं घन पाठ का अभ्यास, शतपथ ब्राह्मण का अध्ययन, बृहदारण्यक उपनिषद का परिचय, यज्ञ आचार्यत्व एवं पौरोहित्य प्रशिक्षण

कृपया ध्यान दें: शुक्ल यजुर्वेद (वेद विभूषण) पाठ्यक्रम की पूर्ण अवधि सात वर्ष निर्धारित है, जिसका उद्देश्य विद्यार्थी को इस शाखा में पूर्ण रूप से पारंगत बनाना है। विस्तृत जानकारी हेतु पाठ्यक्रम विवरणिका पृष्ठ देखें।

"ॐ इषे त्वोर्जे त्वा" — शुक्ल यजुर्वेद का यह प्रथम मंत्र यज्ञ-कर्म के मंगलाचरण का प्रतीक है।