• पुरु॑ष ए॒वेदꣳ सर्वं॒ यद्भू॒तं यच्च॒ भा॒व्य॑म्। उ॒तामृ॑त॒त्वस्येशा॑नो॒ यदन्ने॑नाति॒रोह॑ति॥
  • ए॒तावा॑नस्य महि॒मातो॒ ज्यायाꣳ॑श्च॒ पूरु॑षः। पादो॑ऽस्य॒ विश्वा॑ भू॒तानि॑ त्रि॒पाद॑स्या॒मृतं॑ दि॒वि॥
  • त्रि॒पादू॒र्ध्व उदै॒त्पुरु॑षः॒ पादो॑ऽस्ये॒हाभ॑व॒त्पुनः॑। ततो॑ वि॒ष्वङ्व्य॑क्रामत्साशनानश॒ने अ॒भि॥
  • ततो॑ वि॒राडजायत वि॒राजो॒ अधि॒ पूरु॑षः। स जा॒तो अत्य॑रिच्यत प॒श्चाद्भूमि॒मथो॑ पु॒रः॥
  • तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुतः॒ सम्भृ॑तं पृषदा॒ज्यम्। प॒शूꣳस्ताꣳश्च॑क्रे वाय॒व्या॑नार॒ण्या ग्राम्या॑श्च॒ ये॥
  • तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुत॑ ऋ॒चः सामा॑नि जज्ञिरे। छन्दाꣳ॑सि जज्ञिरे॒ तस्मा॒द्यजु॒स्तस्मा॑दजायत॥
॥ श्रीमते रामनुजाय नमः ॥

ज्योतिष विभाग

ज्योतिष शास्त्र 'वेद के नेत्र' के रूप में प्रतिष्ठित है, जो काल-गणना, पंचांग एवं शुभ मुहूर्त निर्धारण में अनिवार्य भूमिका निभाता है। हमारे विभाग में विद्यार्थियों को इस प्राचीन विज्ञान का व्यवस्थित एवं प्रायोगिक प्रशिक्षण दिया जाता है।

विभागीय आचार्य

आचार्य श्री देवेन्द्र नाथ मिश्र

आचार्य श्री देवेन्द्र नाथ मिश्र

विभागाध्यक्ष – ज्योतिष शास्त्र
विशेषज्ञता: फलित ज्योतिष एवं मुहूर्त शास्त्र
वेद विभूषण, ज्योतिष आचार्य
15+ वर्ष का अनुभव
आचार्य श्री नरेंद्र कुमार शास्त्री

आचार्य श्री नरेंद्र कुमार शास्त्री

सहायक आचार्य – ज्योतिष शास्त्र
विशेषज्ञता: पंचांग गणना एवं वेदांग ज्योतिष
ज्योतिषाचार्य, शास्त्री (संस्कृत)
9+ वर्ष का अनुभव

विषय एवं ग्रंथ परिचय

वेदांग ज्योतिष

ज्योतिष शास्त्र वेदों के छह अंगों (वेदांगों) में से एक है, जिसे 'वेद का नेत्र' कहा जाता है। यज्ञ, अनुष्ठान एवं शुभ कार्यों हेतु उचित समय-निर्धारण में इसकी अनिवार्य भूमिका है।

सिद्धांत, संहिता एवं होरा स्कंध

ज्योतिष शास्त्र मुख्यतः तीन स्कंधों में विभाजित है — सिद्धांत (खगोलीय गणना), संहिता (प्राकृतिक एवं सामाजिक घटनाओं का फलादेश) तथा होरा (व्यक्तिगत जन्मकुंडली एवं फलित ज्योतिष)।

पंचांग एवं मुहूर्त शास्त्र

तिथि, वार, नक्षत्र, योग एवं करण — इन पाँच अंगों से युक्त पंचांग का ज्ञान तथा शुभ मुहूर्त निर्धारण की विधि विद्यार्थियों को सिखाई जाती है, जो यज्ञ-कर्मकांड एवं संस्कारों हेतु आवश्यक है।

बृहत् पाराशर होरा शास्त्र

महर्षि पराशर रचित बृहत् पाराशर होरा शास्त्र फलित ज्योतिष का सर्वाधिक प्रमाणिक ग्रंथ माना जाता है, जिसका अध्ययन उच्च वर्षों में कराया जाता है।

वर्ष-वार अध्ययन क्रम

प्रथम – द्वितीय वर्षपंचांग परिचय (तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण), राशि एवं ग्रह परिचय, संस्कृत में ज्योतिष शब्दावली
तृतीय – चतुर्थ वर्षजन्मकुंडली निर्माण की विधि, ग्रह-भाव फल का प्रारंभिक अध्ययन, मुहूर्त शास्त्र का परिचय
पंचम वर्षदशा-अंतर्दशा गणना, पंचांग शुद्धि एवं शुभ मुहूर्त निर्धारण का प्रायोगिक अभ्यास, वेद भूषण मूल्यांकन परीक्षा हेतु तैयारी
षष्ठम – सप्तम वर्ष (वेद विभूषण)बृहत् पाराशर होरा शास्त्र का गहन अध्ययन, संहिता स्कंध (वर्षफल, प्रश्न ज्योतिष), यज्ञ एवं संस्कार हेतु मुहूर्त निर्धारण में प्रायोगिक दक्षता

कृपया ध्यान दें: ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन मुख्यतः वेद विभूषण पाठ्यक्रम के उच्च वर्षों में एक सहायक विषय के रूप में कराया जाता है, जो यज्ञ-कर्मकांड एवं पौरोहित्य कार्यों हेतु उपयोगी है। विस्तृत जानकारी हेतु पाठ्यक्रम विवरणिका पृष्ठ देखें।

"यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा। तद्वद् वेदांगशास्त्राणां ज्योतिषं मूर्धनि स्थितम्॥" — जैसे मयूर की शिखा एवं नाग की मणि श्रेष्ठ है, वैसे ही ज्योतिष शास्त्र वेदांगों में शिरोमणि है।