ज्योतिष शास्त्र 'वेद के नेत्र' के रूप में प्रतिष्ठित है, जो काल-गणना, पंचांग एवं शुभ मुहूर्त निर्धारण में अनिवार्य भूमिका निभाता है। हमारे विभाग में विद्यार्थियों को इस प्राचीन विज्ञान का व्यवस्थित एवं प्रायोगिक प्रशिक्षण दिया जाता है।


ज्योतिष शास्त्र वेदों के छह अंगों (वेदांगों) में से एक है, जिसे 'वेद का नेत्र' कहा जाता है। यज्ञ, अनुष्ठान एवं शुभ कार्यों हेतु उचित समय-निर्धारण में इसकी अनिवार्य भूमिका है।
ज्योतिष शास्त्र मुख्यतः तीन स्कंधों में विभाजित है — सिद्धांत (खगोलीय गणना), संहिता (प्राकृतिक एवं सामाजिक घटनाओं का फलादेश) तथा होरा (व्यक्तिगत जन्मकुंडली एवं फलित ज्योतिष)।
तिथि, वार, नक्षत्र, योग एवं करण — इन पाँच अंगों से युक्त पंचांग का ज्ञान तथा शुभ मुहूर्त निर्धारण की विधि विद्यार्थियों को सिखाई जाती है, जो यज्ञ-कर्मकांड एवं संस्कारों हेतु आवश्यक है।
महर्षि पराशर रचित बृहत् पाराशर होरा शास्त्र फलित ज्योतिष का सर्वाधिक प्रमाणिक ग्रंथ माना जाता है, जिसका अध्ययन उच्च वर्षों में कराया जाता है।
कृपया ध्यान दें: ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन मुख्यतः वेद विभूषण पाठ्यक्रम के उच्च वर्षों में एक सहायक विषय के रूप में कराया जाता है, जो यज्ञ-कर्मकांड एवं पौरोहित्य कार्यों हेतु उपयोगी है। विस्तृत जानकारी हेतु पाठ्यक्रम विवरणिका पृष्ठ देखें।
"यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा। तद्वद् वेदांगशास्त्राणां ज्योतिषं मूर्धनि स्थितम्॥" — जैसे मयूर की शिखा एवं नाग की मणि श्रेष्ठ है, वैसे ही ज्योतिष शास्त्र वेदांगों में शिरोमणि है।